(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.247. अध्यायः 247
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति विद्याकर्मस्वरूपादिनिरूपकव्यासवाक्यानुवादः॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

शुक उवाच। 12-247-0x(6242)(75395)
यदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च।
कां दिशं विद्यया यान्ति कां च गच्छन्ति कर्मणा॥ 12-247-1(75396)
एतद्वै श्रोतुमिच्छामि तद्भवान्प्रब्रवीतु मे।
एतच्चान्योन्यवैरूप्ये वर्तेते प्रतिकूलतः॥ 12-247-2(75397)
भीष्म उवाच। 12-247-3x(6243)
इत्युक्तः प्रत्युवाचेदं पराशरसुतः सुतम्।
कर्मविद्यामयावेतौ व्याख्यास्यामि क्षराक्षरौ॥ 12-247-3(75398)
यां दिशं विद्यया यान्ति यां च गच्छन्ति कर्मणा।
शृणुष्वैकमना वत्स गह्वरं ह्येतदन्तरम्॥ 12-247-4(75399)
अस्ति धर्म इति ह्युक्त्वा नास्तीत्यत्रैव यो वदेत्।
तस्य पक्षस्य सदृशमिदं मम भवेदथ॥ 12-247-5(75400)
द्वाविमावथ पन्थानौ यत्र वेदाः प्रतिष्ठिताः।
प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो निवृत्तौ च व्यवस्थितः॥ 12-247-6(75401)
कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया तु प्रमुच्यते।
तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः॥ 12-247-7(75402)
कर्मणा जायते प्रेत्य मूर्तिमान्षोडशात्मकः।
विद्यया जायते नित्यमव्ययो ह्यक्षरात्मकः॥ 12-247-8(75403)
कर्म त्वेके प्रशंसन्ति स्वल्पबुद्धितया नराः।
तेन ते देहजालानि रमयन्त उपासते॥ 12-247-9(75404)
ये स्म बुद्धिं परां प्राप्ता धमैर्नपुण्यदर्शिनः।
न ते कर्म प्रशंसन्ति कूपं नद्यां पिबन्निव॥ 12-247-10(75405)
कर्मणः फलमाप्नोति सुखदुःखे भवाभवौ।
विद्यया तदवाप्नोति यत्र गत्वा न शोचति॥ 12-247-11(75406)
यत्र गत्वा न म्रियते यत्र गत्वा न जायते।
न जीर्यते यत्र गत्वा यत्र गत्वा न वर्धते॥ 12-247-12(75407)
यत्र तद्ब्रह्म परममव्यक्तमचलं ध्रवम्।
अव्याहतमनायासममृतं चावियोगि च॥ 12-247-13(75408)
द्वन्द्वैर्न यत्र बाध्यन्ते मानसेन च कर्मणा।
समाः सर्वत्र मैत्राश्च सर्वभूतहिते रताः॥ 12-247-14(75409)
विद्यामयोऽन्यः पुरुषस्तात कर्ममयोऽपरः।
विद्धि चन्द्रमसं दर्शे सूक्ष्मया कलया स्थितम्।
`विद्यामयं तं पुरुषं नित्यं ज्ञानगुणात्मकम्॥' 12-247-15(75410)
तदेतदृषिणा प्रोक्तं विस्तरेणानुमीयते।
नवं तु शशिनं दृष्ट्वा वक्रतन्तुमिवाम्बरे॥ 12-247-16(75411)
एकादशविकारात्मा कलासंभारसंभृतः।
मृर्तिमानिति तं विद्धि तात कर्म गुणात्मकम्॥ 12-247-17(75412)
`तस्मिन्यः संस्थितो ह्यग्निर्नित्यंस्थाल्यामिवाहितः।
आत्मानं तं विजानीहि नित्यं त्यागजितात्मकं॥ 12-247-18(75413)
देवो यः संश्रितस्तस्मिन्नब्विन्दुरिव पुष्करे।
क्षेत्रज्ञं तं विजानीयान्नित्यं योगजितात्मकम्॥ 12-247-19(75414)
तमोरजश्च सत्त्वं च विद्धि जीवगुणात्मकम्।
जीवमात्मगुणं विद्यादात्मानं प-----नः॥ 12-247-20(75415)
अचेतनं जीवगुणं वदन्ति
स चेष्टते चेष्टयते च सर्वम्
ततः परं क्षेत्रविदो वदन्ति
प्राकल्पयद्यो भुवनानि सप्त॥ ॥ 12-247-21(75416)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-247-3 क्षराक्षरौ नश्वरानश्वरौ मार्गाविति शेषः। पराशरसुतः शुक मिति ध. पाठः॥ 12-247-13 यद्याति परमं ब्रह्म पुराणमचलमिति ट.ड. पाठः॥ 12-247-21 स चेष्टते जीवयते चेति झ. पाठः॥


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